क्या कहें की ये ग़म मिटता ही नहीं

Law life aur multigyan
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Poetry



क्या कहें की ये ग़म मिटता ही नहीं 

हमें इस ग़म को भुलानें का मौका मिलता ही नहीं 

बात पुरानी हो गयी 

पर जख़्म अभी ताज़ा है 

उन जख्मों को मिटा सके, ऐसी मरहम मिलता ही नहीं 

हमारी चाहत भी बेइंतहा थी 

अब उसका दर्द इम्तिहान लेता है हमारा 

हमें इस दर्द से छुटकारा मिलता ही नहीं 

 घाव बड़े गहरे दे दिये किसी नें, उसे लेकर फिरतें हैं हम राहों में 

क्या कहें की अब कोई इन घाव को सिलता ही नहीं 




अगर साथ चलनें का इरादा ना था 

तो साथ देने का वादा क्यों किया 

ना हमसे मुहब्बत थी तो 

मुहब्बत का वादा क्यों किया 

हम तरसते रह गयें तेरे प्यार के ख़ातिर 

तूने प्यार का झूठा फ़साना क्यों दिया 

हम हो गयें बेबस हमारी उम्मीद टूट सी गई 

ना होना था तुम्हें उम्मीद हमारी 

फिर हमें उम्मीद का दिलासा क्यों दिया 



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