Poetry
हम ना कर सकें सब्र ये बेसब्री ही कुछ ऐसी थी
हम तुझको पाकर सबकुछ लुटा गयें
तुझे पाने की चाहती ही कुछ ऐसी थी
नहीं है ग़म की हम अपना सबकुछ लुटा कर आयें हैं
है दिल में बस खुशियों की दस्तक
हम तुझे अपना बना कर आयें हैं
अब ज़रुरत नहीं हमें इस ज़माने की
अब बस ज़रुरत मुहब्बत निभानें की
ना पूछो की तुझे पाकर हमनें क्या पाया है
जैसे पतझड़ के बाद हर शाख पर बसंत छाया है


