मुहब्बत में लुट भी जातें हम

Law life aur multigyan
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Poetry 



 मुहब्बत में लुट भी जातें हम तो ग़म क्या ग़म था 

ग़म तो इस बात का है हमें लूट लेने वाला हमारा अपना था 

जिसे अपने दिल का सरताज बनाया 

इस दिल को तोड़ जाने वाला मेरा अपना था 

हम हो जाते बदनाम ना रह जाते किसी के क़ाबिल 

हमें ग़म होता उस बदनामी का 

पर हमें बदनाम करनें वाला हमारा अपना था 

 हम इस कदर टूटें की खुद को जोड़ पातें नहीं

हमें टुकड़ों में बांट जाने वाला हमारा अपना था 



हमारा नसीब कहाँ ऐसा जो तुम्हें हम अपना नसीब बना सकें

पर इस दिल के पास इतनी हिम्मत नहीं जो ये तेरे बगैर धड़क सके

हमारा मिट जाना या आबाद हो जाना 

सब कुछ अब तेरे हाथ है

तेरे बिन हम मिटा भी सकें खुद को हमारी ऐसी कहाँ हैसियत है 

जब सौप दिया खुद को तुझे 

अब मेरा खुद पे भला कौन सा हक बनता है 

ये दिल तेरे पास में ना होने पर अन्दर ही अन्दर मरता है 

हम तेरे बगैर जी सकें ऐसी हमारे खुद में हिम्मत कहाँ

एक खोटे से नसीब की दुहाई लेकर हम ना जानें हैं भटकतें कहाँ 



इश्क़ में तूझे पाने की ज़िद है 

अब तो तेरी मुहब्बत में खुद से हार जाने की ज़िद है 

होगा ये ज़माना रुसवा भले ही  

पर तूझे पा लेने की ज़िद है 

तेरी मर्ज़ी है क्या वो भी तो बता देना 

होगा तेरा भी इरादा इश्क़ हमें एक इशारा देना 

 हर दहलीज़ अब पार जानें की ज़िद है 

तेरे इश्क़ में मिट जाने की ज़िद है 

मुझे मालूम नहीं तेरी ख़्वाहिश क्या है 

पर इश्क़ में तेरी ख़्वाहिश बन जाने की ज़िद है 

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