तुम मिलो तो सही हम ये ज़माना छोड़ देंगे

Law life aur multigyan
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Poetry 



तुम मिलो तो सही हम ये ज़माना छोड़ देंगे 

तुम्हें पा कर हम खुद को छोड़ देंगे 

देखें होगें तुमनें मुहब्बत में दिवानें कई 

पर हमसा दिवाना कहीं देखा होगा नहीं 

जो मुहब्बत हमारी करलो क़बूल तुम

हम तुम्हारे लिए अपनी दुनिया छोड़ देंगे 

ना होगे दूर तुम ये वादा करलो हमसे 

कोई शिकायत भी हो तो वो तुम कहलो हमसे 

जिस गली में तेरी रौनक ना उस गली को हम छोड़ देंगे 

जो आदत हमारी तुम्हें गंवारा नहीं उस आदत को हम छोड़ देंगे 

कहते हैं हम मुहब्बत की कसम लेकर 

ना हुये जो तुम हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा 

उस ज़िंदगी को हम छोड़ देंगे 




हम अंजान थें इश्क़ के अंजाम से 

हम थे खुद से भी बेगाने से 

ना था चैन हमारे पास, ना थी राहतें 

ना थी कोई वजह जिस पर हम इतराते 

तुमने आकर हमें वजह दे दी ज़िन्दगानी की 

शुरू कर दी कहानी मुहब्बत के बन्दगानी की 

अब रखतें नहीं हिसाब कोई अपनी हसरतों का 

जबसे मुझे वजह मिली तुझसे आशिकी की 

अब हम ना हैं अंजान मुहब्बत से 

जबसे हुयी पहचान हमारी तुम्हारी मुहब्बत से 


मुहब्बत में किसी ज़िद का क्या वजूद 

आशिक का उसकी आशिकी में कैसे उसूल 

मुहब्बत के सिवा कोई बन्दगी प्यारी नहीं 

हार जाये ज़माने से मुहब्बत

वैसी मुहब्बत हमारी नहीं 

ना फिकर है कोई, ना बन्दिश है कोई 

मुहब्बत से अलग हमारी कोई रौनक नहीं 

मुहब्बत में कोई हद हो भी जाये तो उसका क्या फर्क है 

पर हर आशिक़ की तरह हमारी मुहब्बत भी बेहद है 




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