Poetry
वक़्त के बीत जानें का हम मलाल क्या करें
वक़्त के साथ एक दिन हम भी बीता कल बन जायेंगे
ना बाकी रह जायेगा कोई निशान
हम ज़मानें के लिए अंजान हो जायेंगे
वक़्त का गुज़र जाना ये वक़्त की फ़ितरत है
पर अपनें वक़्त का सिरताज होना ये हमारी फ़ितरत है
क्या करें मलाल की कल क्या हो जायेगा
आज कोई जायेगा तो कल कोई और आयेगा
जो जी सके इस पल में बगैर कल की सोचे
उसे अपने वक्त का सिकन्दर होने से भला कौन रोके
जितने भी हैं यहाँ अंंजाम सबका एक है
ना पूछेगा वक़्त की पैसों से भरी किसकी जेब है
एक पल एक बाद सब गुज़रा पल बन जायेंगे
उन निशानों का क्या करें जो खुद भी मिट जायेंगे
ज़िन्दगी बस इस पल में हसीन हैं बाकी बयान क्या करें
वक़्त के बीत जाने का हम मलाल क्या करें


