Poetry
लहर बनकर समंदर में मिल जाना है
हम मुसाफ़िर हैं हमें तो बस चलते जाना है
मंज़िल कब मिलेगी खबर नहीं
रस्ते पर टिकी निगाहें हैं
बस अपनें पीछे कुछ निशान छोड़ जाना है
क्या मलाल हो हमें इसका की हमें कोई पहचानता नहीं
क्या शिकायत इसकी की हमें कोई अपना मानता नहीं
हमें दरिया की धारा में बह जाना है
हम मुसाफ़िर हैं हमें तो बस चलते जाना है
अपनी धुंधली सी छाप ज़मानें पर क्या छोड़ें
हर छाप को एक दिन मिट जाना है
सफर है लम्बा और हम राहीं हैं इसके
हम मुसाफ़िर हैं हमें तो बस चलते जाना है


