मैं काफ़ी हूँ,

Law life aur multigyan
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Poetry 


 मैं काफ़ी हूँ, मुझे मुझसे अलग लगता ये ज़माना है

मेरे लिए मेरे भीतर ही बसता एक ज़माना है

अपनें ज़मानें से मुझे नाता निभाना है 

मैं काफ़ी हूँ, 

रहता नहीं ये दिल भरम किसी के 

अब मैं खुद ही खुद में बाकी हूँ 

मै काफ़ी हूँ 

आदत नहीं है रुकनें की, किसी के कदमों तले झूकनें की 

मैं हूँ अपनें जहां का सिरताज ,मैं काफ़ी हूँ 

ना है तलाश की सहारे की, मैं किसी और के सहारे की कहानी हूँ 

मैं काफ़ी हूँ 

मेरे अन्दर भरा समन्दर है, इस समन्दर की मैं हर लहर हूँ

जो जगा ना सालों से, मैं ऐसा सोया कहर हूँ 

कोई धार नहीं जो काट सके, कोई सीमा नहीं जो बांध सके 

मैं सबसे अलग अपनी पहचान हूँ 

मैं काफ़ी हूँ 




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