Poetry
वक्त के साथ ये वक्त भी ढ़ल जायेगा
कभी जो वक्त अभी लोहे ज़जीर सा वो भी एक दिन पिघल जायेगा
वक्त हर बार एक जैसा होता नहीं
कौन कहता है की डूबा सूरज फिर से निकलता नहीं
वक्त जोआज रुठा सा है कल वो मान जायेगा
लेकर अनन्त सा भोर ये फिर से लेकर आयेगा
जो बीत गया वो बस बीते कल में हैं
हम जी लेतें है, जीन्दगी तो बस इस पल में है
क्या पता कल कौन अपनी राहें बदल देगा
होगी मर्जी जहां वो उस राह के चल देगा
जो बिगड़ गया क्या बनायें उसे
जो बिगड़ने को है पहले हम सम्भाले उसे
जब होगा इरादा मजबूत सब यूँ ही सम्भल जायेगा
जो किरने जलाती हैं हर पल उनका जलना चाँद की ठंडक भरी रौशनी में बदल जायेगा


