Poetry
ये ज़माना भूल जाये मुझे कोई ग़म नही
बस अपने दिल के किसी कोने मेरी याद सम्भाल के रखना तुम
ना अपना सका ये ज़माना मुझे
पर मुझे अपना कर कहीं दिल में छिपा कर अपना बना कर रखना तुम
ज़माने ने हर बार नकारा है मुझे
पर मुझे अपना बना कर रखना तुम
मुझे मालूम नही आने वाले अगले पल का
अगर मैं खो जाऊं कहीं भी अपने दिल से मुझे खोने ना देना तुम
जो मेरी अर्जी़ कर लो कबूल तुम, तो रस्ता आगे का तय कर लेंगे हम
हजारो है आशिक इस मुहब्बत के शहर में
पर सबकी दुआ कहाँ कबूल होती है
जो हो जाये कबूल दुआ इश्क की, सच्ची मुहब्बत तो वो बस एक होती है


