Poetry
बदलने दो हवा के रुख को ,हम भी इस बदलाव को देखेंगे
बदल जायेगा पूरे ज़मानें का रुतबा
हम बदले हुये आसमान को देखेंगे
आज बेकदर पडा़ है जो, कल उसकी कदर होगी
बिन किमत जो पडा़ है आज, कल उसकी भी किमत होगी
कुछ पल का अंधेरा बाकी है
या ये फिर आने वाले सवेरे की झाकी है
एक झोंका आने की देर है बस
खुद के तैयारी की बारी है अब
वो रुख जहाँ से गुज़रेगा, संग अपने बदलाव लेकर गुज़रेगा
हम भी होंगे साथी इसके, हम भी बदले रंग देखेंगे इसके
बदलने दो हवा के रुख को,हम भी इस बदलाव को देखेंगे
टूट जाने दो इन ग़मोंं की बेडि़यों को, खुद को हम आजाद देखेंगे


