दिल के किसी कोने में छिपा हुआ

Law life aur multigyan
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Poetry



दिल के किसी कोने में छिपा हुआ

मेरा हर जज्बात है जैसे मरा हुआ

खुद अपनें क़तल का इल्जाम है हमपर 

मेरा वजूद खुद से हारा हुआ

सिमट जाने दो जितना जिन्दगी को सिमटना है

हम कर पातें नहीं इलाज इस मर्ज़ का

हजारों की भीड़ में खुद को अकेला पाया है

जाने क्या है ग़लती जो यूं मातम सा छाया है

बिखर गयें हम ना जाने कितनें टुकडो़ में

हमारा दिल ना जाने कितनें टुकडो़ में बिखरा है

जिस अंधेरे का कोई अंत नहीं 

मेरे चारो ओर फैला वही अंधेरा है



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