Poetry
मुहब्बत पर बन्दिशों का साया रहा
ये दिल भी ज़माने से हारा रहा
जम गई धूल यादें धुधंली हो गयीं
आया अंधेरा ऐसा मुहब्बत में कयामत हो गयी
जि़द की हर दहलीज़ पार करने का इरादा था मुहब्बत में
लगी चोट ऐसी मुहब्बत ही ग़मगीन हो गयी
बिखर कर खुद समेटना आता था हमें
हुआ आलम ऐसा हमें बिखरने की आदत होगयी
अब हर वक्त में उसकी एक याद का सहारा रहा
जी कर मुहब्बत को हर पल में, फिर भी ये दिल बेसहारा रहा


