ऐ जि़न्दगी

Law life aur multigyan
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Poetry


ऐ जि़न्दगी तू मुझसे समझी ही ना गयी

जो कभी समझा तुझे तो तू मुझसे कही ही ना गयी

तेरी राहों में दरारें आना लाज़मी ही था

पर उन दरारों से लगी चोट कभी भरी ही ना गयी

सम्भाला खुद को बहुत पर सम्भल ना सकें

जि़न्दगी तू मुझसे मिलकर भी कभी मुझसे मिली ही नहीं

हो जाती मर्जी़ तेरी बन जातें हमराही हम

हर ग़म को बहारों के जैसा प्यार लेते हम

हर वक्त जो कहनी थी बात तुझसे

कभी मुझसे वो कही ही ना गयी

ऐ जि़न्दगी तू कभी मुझसे समझी ही ना गयी



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