ये रुठे पन्ने

Law life aur multigyan
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Poetry



ये रुठे पन्ने अब मेरी दस्तां कहतें कहाँ हैं

ज़ख्म देने वाले हजा़रों हैं पर मरहम लगाने वाले कहाँ हैं

किस्मत ने कुछ लकीरें खींच दी

उन लकीरों के पार अब हम जाते कहाँ हैं

हर ओर छाया सन्नाटा सा है

नजा़रों में भी बहारें अब कहाँ दिखतीं हैं

जो कुछ मिठी यादें थी,मिल गई खा़क में

जो ढे़र फैला है चारो ओर वो तो बस उन यादों की मिट्टी है

करें किस पैबंद का इंतजा़म जो हमारे घावों को ढ़क लें

मिलती नहीं कोई दवा जिसे हम अपनें पास में रख लें

कभी थी शान हमारी भी सारे ज़मानें में

पर इस ज़माने लोग हमसे अब वास्ता रखतें कहाँ हैं

जो कह सके हमारा भी किस्सा वो पन्ना भला बिकता कहाँ है

जिन पन्नों में कभी छपतें थें इश्तिहार हमारे

वो रुठे पन्ने अब मेरी दास्तां कहतें कहाँ हैं







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