वक्त ने ज़रा रंग क्या बदला

Law life aur multigyan
0

Poetry


वक्त ने ज़रा रंग क्या बदला 

इस ज़मानें ने अपनी रंगत दिखा दी

हमे ज़रा अंधेरो ने क्या जकडा़

ज़मानें नें हमें हमारी हैसियत दिखा दी

कुसूर ज़रा हम भी कर गयें, भला किसी पर इतना यकीन कौन करता है

इस ज़मानें की भी बस है यही पहचान,ये हर पल में अपनी रंगत बदलता है

हम थे इस भरम में चूर ये ज़माना हमारे काम आयेगा

भला जो आया नहीं कभी खुद के काम वो हमारे काम क्या खा़क आयेगा

ये आदत है इस ज़माने की, खुद को ही बनाने वाले को मिट्टी में मिलानें की

जो खुद ही रौशन हुआ चिराग से हमारे

भला हमारी ही रौशनी बुझा कर खुद के लिये रौशनी कहाँ से लायेगा

जो आ ना सका खुद के काम, वो ज़माना भला हमारे काम क्या आयेगा

हमनें अपनी रौनके खुद से अलग करके

इस ज़मानें को रखा सजा कर के

ना खा सका तरस फिर भी ये ज़माना हमपर

बढ़ आगे हमें दरकिनार करके

भला कैसे करें यकीन इसका, ये किसी दिन हमारी ही कब्र खुदवायेगा

ये दस्तूर है इस ज़माने का

जो आया काम इसके,ये कभी ना उसके काम आयेगा




 

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)