तुम साथ हो अगर मेरे,

Law life aur multigyan
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Poetry 



तुम साथ हो अगर मेरे, चाहे हो कितनें अंधेरे 

होगा सफर भी सुहाना ,आयेंगे लौट के सवेरे

पर मुझे इन अंधेरों के पल को भी जीना है 

तेरे संग ज़िन्दगी के ग़मों को भी पीना है 

ना होगा कोई शिकवा, ना होगी कोई शिकायत 

वक्त भी ना कर सकेगा कोई हिमाकत 

हम सितम भी सह लेंगे ज़माने का 

हमें है बस तेरी आदत 

लौट के आयेंगे मुहब्बत के सारे हसीन पल 

छट जायेंगे सारे अंधेरे, रहना बस तुम साथ में मेरे 



हमें ना करना दरकिनार की हम टूट जायेंगे 

जो नाते हमनें बनाये दिल के सब छूट जायेंगे 

हमें अब आदत नहीं ग़मों को दिल से लगाने की 

तुम भी कोशिश करना हर पल ये रिश्ता निभाने की 

ज़माने का क्या है ये तो हर दग़ा देगा 

आशिको को बदनाम कर बस उनका क़सूर करेगा 

पर हम इसके क़सूर से भी पार जायेंगे 

उस जहां में जाकर बस मुहब्बत ही पायेंगे 

बस मुहब्बत में तुम ना करना कसूर कोई 

तेरे क़सूर से हम मर से जायेंगे 

हमें ना करना दरकिनार की हम टूट जायेंगे 


हर दर्द को हम सह लेंगे 

बस बेवफाई का ग़म हमें ना देना 

हम हर मुश्किल पार कर लेंगे 

बस साथ हमारा दे देना 

ना होगा कोई मलाल हमें 

तुम भी ना रखना शिकवा कोई 

हमें है तेरी ज़रूरत, ना हमारी और ज़रुरत कोई 

दिल की चाहत लेकर हम तेरे रस्तें आयें हैं

तुम भी अब ना करना बहाना कोई 

जो तू राज़ी हो रज़ा में मेरी 

ना होगी और मेरी रज़ा कोई 



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