वो चले किसी और राह पर

Law life aur multigyan
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Poetry 



वो चले किसी और राह पर

अब हमारी मुहब्बत मुकम्मल क्या होगी 

कहतें हैं जीत जाता है सच्चा प्यार 

पर हमारी मुहब्बत तबाह होगी  

हमनें ना छोड़ कोई दर उनका साथ पाने के लिए 

पर वो तो तैयार बैठें हैं दूर जाने के लिए 

 आसान सी राहें भी अब मुश्किल होंगीं 

अब क्या ख़ाक हमारी मुहब्बत मुकम्मल होगी 

ज़िद हमारी है उन्हें पानें 

पर इश्क़ में ज़िद जायज़ नहीं 

अब उनकी राहें मेरी राहों से जुदा होगी 

मेरी मुहब्बत अब ना मुकम्मल होगी 



उनकी सौगात में खुद को लुटा आयें 

जो पल कीमती था हमारा, हम उनके साथ जी आये 

हमें मालूम नहीं था उन्हें वक़्त ज़ाया करनें की आदत है 

उनका मुस्कुराकर चले जाना हमें लगा उनकी अदा है 

हम अंजान थे अपनें इश्क़ के नसीब से 

रह कर पास भी उन्हें ना जान सके करीब से 

जो था हमारा हम सबकुछ उनपर लुटा आयें 

हम भी वो प्यार उनके पास छोड़ आयें 

ये दिल कब मानेगा उनके बग़ैर ,पर इसको मनाना है 

अब हमें भी इस झूठी महफ़िल से दूर जाना है 



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