गुलाम हो गयें जबसे हम

Law life aur multigyan
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Poetry 


गुलाम हो गयें जबसे हम इश्क़ के 

किसी और की बन्दगी हमें अब आती नहीं 

 लग गयी है आदत ऐसी इश्क की 

अब कोई और आदत लगती नहीं 

हम अकेले भलें थें या इश्क़ के साथ भलें हैं 

ये दिल कुछ समझ पाता नहीं 

हमारे हर ओर बस इश्क़ है 

इससे हम पल भर के लिए भी अलग हो पातें नहीं 

जी सकतें हैं हम खुद से अलग होकर 

पर इश्क़ से अलग हो कर रह पातें नहीं 




बेवजह होना भी एक वजह है 

तेरा साथ ना होना एक सज़ा हैं 

तू साथ होत हो तो सुकून मिलता है 

तेरे बिना मिला सुकून भी सज़ा है 

हमें आदत नहीं राहों में अकेले चलनें की 

हर पल आदत है तेरे संग में रहनें की 

ना जानें तेरे दूर होने की क्या वजह है 

तुझ बिन बीता हर पल एक सज़ा 

तू है जो मेरे साथ तो जीनें की खास वजह है 

तेरे बिन बीता हर पल एक सज़ा है



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