गुज़र गया वक़्त मुहब्बत का
अब वो क्या लौट के आयेगा
पर चाहा है जिसे शिद्दत से इस दिल ने
उसके अलावा ये दिल किसी और पर ना आयेगा
घूम लिया सारा जहां हमनें
पर किसी और पर ये दिल आया नहीं
ऐसा खोया ये उसकी यादों में
के लौट के फिर मेरे पास भी आया नहीं
वो चला गया अब दूर, ना अपनी यादें लेकर जायेगा
इश्क़ का ये नाकाम सा मुक़ाम मेरी जान लेकर जायेगा
अपनें हारने का ग़म नहीं ,तेरे जीत जाने की ख़ुशी है
तू दूर है आज मुझसे ये तेरी ही तो मर्ज़ी है
अकेले थें, रह लेंगे आगे भी अकेले हम
बस दर्द तब होगा, जो होगा तू तन्हा कभी भी
तू अपनी तन्हाई में ही याद कर लेना हमें
जो मर्ज़ी हो बुला लेना हमें
तेरी महरबानी रही तूने हमें मुहब्बत से मिलाया
तेरख इश्क़ हमें खुद से भी दूर ले आया
मैनें कह दी अपने दिल की बात आगे तेरी मर्ज़ी है
तू कर ले किसी पल में याद मुझे, बस इतने में ही मेरी ख़ुशी है



