हम जब तुमसे दूर थें, हम

Law life aur multigyan
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Poetry 



हम जब तुमसे दूर थें, हम तब खुद के भी ना करीब थें

हुयी मेहरबानी तेरी, हो गये अमीर हम 

तुझसे अलग रह कर हमारा भी वजूद कहाँ था 

किसी धुंधली सी तस्वीर सा 

अपनें दिल का नसीब था 

हमें क़बूल ना था खुद का भी दीदार पाना 

पर तुमनें आकर हमें खुद से मुहब्बत का इल्म कराया था 

तुम साथ हो जो ज़िन्दगी की उम्मीद है 

हमें अब ना होगा ग़म कोई अपनें मिटने का 

हमनें अपनें दिल से किया है इरादा साथ में तेरे रहनें का 


जबसे लगा ये दिल तुझसे, कहीं और ये ठहरता नहीं 

हम कर लें कोशिश कोई 

ये दिल कहीं ठहरता नहीं 

हमें खबर ना लगी, हमें कब तेरी आदत लग गयी 

हमसे जुड़ी यादें तेरी कब हमारी ज़िन्दगी बन गयी 

हमारे दिल का किसी से लग जाना ख्वाब सा था 

पर तुमसे मिलना हमारी मुहब्बत का आग़ाज़ सा था 

कि अब तबीयत भी भली रहती नहीं बिना तुम्हारे 

ज़िन्दगी का एक पल भी आसानी से गुज़रता नहीं बिन तुम्हारे

अब बिन तेरे ये दिल कहीं लगता नहीं 

तेरी आदत लगी ऐसी की ये दिल कहीं ठहरता नहीं  



 

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