हुक्म होगा जो मुहब्बत में

Law life aur multigyan
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Poetry 



हुक्म होगा जो मुहब्बत में तेरा हम मान लेंगे 

कह दो एक बार, मुहब्बत में हम अपनी जान देंगे 

पर हमसे मुंह फेर कर हमपर कहर ना करना 

हम दिवानें हैं तुम्हारे इतनी तो हमपे रहम करना  

खींच लो मुहब्बत में लकीरें हज़ारों हमारे ख़ातिर 

तेरे गुनाह से बचने को हम उन लकीरों में सिमट जायेंगे 

ना होगी इजाज़त तुम्हारी अगर 

फिर भी हम अपनी मुहब्बत तुमपे लुटातें जायेंगे 

दिल में बस बस तेरे लिए मुहब्बत लियें फिरतें हैं हम 

मांग लो एक बार हम ये दिल तुम्हें देकर जायेंगे 


करम ज़रा मुहब्बत का हमपे कर लेना 

सुना है तुम खुदा की बनायी नवाज़िश हो 

मेरा दिल भटका है बगैर मुहब्बत के 

जैसे कोई लावारिस हो 

है गुज़ारिश तुमसे हमारी, गुज़ारिश हमारी क़बूल करनें की

हो तुम खुदा की नवाज़िश, 

अदा है तुझमें मेरी तकदीर बदलनें की  

मुझे मालूम है लोग इश्क़ में खुद को भी खो देतें

अगर मैं कहीं खो जाऊं तो तकल्लुफ़ कर लेना मेरी पहचान बननें की 




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