क्या रखें हम मुहब्बत की कोई आरज़ू

Law life aur multigyan
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Poetry 





क्या रखें हम मुहब्बत की कोई आरज़ू 

हमें मुहब्बत मिल ही कब पायेगी 

मिल भी गई अगर ये हमें 

इक वक़्त पर अकेला छोड़ जायेगी 

मुहब्बत का नसीब ऐसा है, या फिर मुहब्बत करनें वालों का 

ये अपनें पास बुला कर फिर अंधेरों में ढ़केल जायेगी

जिन्हें आदत नहीं किसी महफिल की 

उन्हें ये अपनी महफ़िल की आदत लगायेगी 

भला क्यों करलें हम यक़ीन इसपर 

जब ये इक दिन अकेला छोड़ जायेगी 



इश्क़ में दिल का टूट जाना ये इश्क़ की फ़ितरत है 

मुहब्बत करनें वालों की बस एक यही कीमत है 

अपनी मुहब्बत के लिए हम तरस जायेंगे 

होगा फर्क क्या अगर इसमें हम मर जायेंगें 

हमारी मुहब्बत की ऐसी ही क़िस्मत है 

ना मिल पायेगा कभी वो जिसकी हमें हसरत है 

हम जान नहीं पायेंगें, हमारा नसीब मुहब्बत में कितना चमकेगा 

या दिल तड़पकर मुहब्बत में बस अपनी जान देगा 

फिर भी इश्क़ में मिट जाना एक आशिक़ की हसरत है 

मिटा देना आशिक़ के निशां ये इश्क़ की फ़ितरत है 








 

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