ना मुनासिब लगी उन्हें मुहब्बत हमारी

Law life aur multigyan
0

Poetry 


ना मुनासिब लगी उन्हें मुहब्बत हमारी 

वो बीच राहों में हमें छोड़ गयें 

लगी है आदत उनकी हमें, हमनें ये इज़हार किया 

फिर भी वो ये दिल तोड़ गयें

हमनें शामिल किया उन्हें अपनी तन्हाई में भी 

पर भरी महफ़िल में वो हमें अकेला छोड़ गयें

ना उम्मीद थी हमें उनसे जिस सितम की 

वो सारे सितम हमपे कर गयें 

किया हश्र हमारा मुहब्बत में ऐसा 

हम जीते जी ही मर गयें 



वो करतें हैं शिकायत हमसे अपनी अधूरी चाहतों की

पर हमारे दिल का दर्द उन्हें कभी दिखता ही नहीं 

वो हो जातें हैं दूर हमसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक 

पर हमारा दिल उनसे दूर होता ही नहीं 

हर बार वो आगे बढ़ जातें हैं, हमें राहों में अकेला छोड़ कर

पर हमारी परछाई भी बिन उनके चलती ही नहीं 

होंगे मुहब्बत में उनके उसूल कुछ और 

हमें तो उनके सिवा कोई उसूल दिखता ही नहीं 

 अब चाहें वो हमें आबाद करें, या करदें बर्बाद हमें 

पर हमारा दिल इस कदर जुड़ा है उनसे 

की खुद से भी वो ऐसे जुड़ता ही नहीं 





 

  

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)