हम ना जाने कब उनके होकर

Law life aur multigyan
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Poetry 




हम ना जाने कब उनके होकर 

खुद से ही जुदा हो गयें 

हमें आदत नहीं थी किसी के इबादत की 

ना जाने कब वो हमारे खुदा हो गयें 

हम चलते गयें उनकी राहों पे 

उनकी निगरानी में हम खुद से ख़फा हो गयें 

फिर सोचा मुहब्बत की राहें इतनी आसान तो नहीं 

या कहीं हमारी मुहब्बत में मिलावट तो नहीं 

दिल से किये इन बहानों के क्या अंजाम हो गयें 

हम हो ना सकें उनके, और खुद से भी जुदा हो गयें 




ये मुहब्बत किसी साज़िश का अंजाम तो नहीं 

इसके सिवा किसी आशिक़ को कोई और काम तो नहीं 

हो जाये मुहब्बत मुकम्मल ऐसा होता कहाँ है 

फिर भी हो जाये कोई शिकवें किसी से 

सच्ची मुहब्बत में ऐसा होता कहाँ है 

मुहब्बत में दिल को बहला लेने के बहाने मिल ही जातें हैं

कर ना पायें इसमें कोई मुकाम हासिल 

ऐसे आशिक़ मिल ही जातें हैं 

पर मुहब्बत में किसी का हक़दार बन जाना जायज़ तो नहीं 

कर बैठे कोई आशिक़ मुहब्बत में किसी पर हुकूमत 

सच्चे आशिक़ का होता कोई ऐसा ईमान तो नहीं 





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