Poetry
हम हो गयें उसकी मुहब्बत में गुमनाम
अब हमें अपना निशान भी मिलता नहीं
हम ज़माना छोड़ आयें जिसके लिए
अब साथ उसका मिलता नहीं
ना है वो बेख़बर हमारे हलातों से
ना अन्जान है मेरे मुहब्बत के इरादों से
पर उसके इरादों को जान ना सकें हम
उसका असकी चहरा ना पहचान सकें हम
खो गयी पहचान हमारी और मुहब्बत भी गुमनाम हो गयी
जो कभी हमारी किस्मत हमसे रुठ गयी
हम खुद को रहें ढूँढ पर खुद को ही हम मिलतें नहीं
मिला इश्क़ में घाव ऐसा, किसी मरहम से भरता नहीं

