Poetry
इस गुमनाम से जहां में मेरा नाम कहाँ है
जो छोड़ दे इस वक़्त पे अपनी छाप ऐसा मेरा निशान कहाँ है
दिल में है जो कुछ ज़ुबा पर आता नहीं
दर्द भी गहरा है, दिल से इसका पहरा जाता नहीं
है हद इस ज़माने की भी ये अकेला रहनें देता नहीं
हम होना चाहें इसके तो ये हमारा होता नहीं
ना है कोई निशान ना कोई सुबूत हैं
यूं बेनिशान सा होकर क्यों जीने को मजबूर हैं
ना है पता की हमारा वजूद कहाँ है
बिन वजूद के सब कुछ ठहरा सा हुआ है
वक्त ठहरता नहीं उम्र थमती नहीं
वक्त के पास ठहरनें का वक्त कहाँ
उम्र ढलती है हर पल इसके पास हमसे मिलनें का वक्त कहाँ
इस पल का पता नहीं, अगले पल का हिसाब क्या रखें
वक़्त जो गुज़र गया उसके गुज़रनें की वजह क्या पुछें
रहम मिली हो ज़मानें की भले
वक़्त की रहम कभी मिली ही नहीं
कभी जान लेते हम एक दूजे के हालात
पर ये उम्र फुर्सत से कभी मिली ही नहीं



