फूल की पंखुड़ियां बिखर गयीं

Law life aur multigyan
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Poetry 


फूल की पंखुड़ियां बिखर गयीं

कभी लगीं थीं एक साथ में, जुड़ीं थी जो एक सांस में 

खुद के हिस्से से मिलनें को तरस गईं

अपना किस्सा भी कुछ ऐसा ही है 

जिसको मान बैठें थें अपना सहारा हम 

ना पा सकें उसका सहारा हम 

उसकी एक झलक को भी आंखें तरस 

बिन उसकें जानें कितना बरस गईं

वो अंजान रहा हमसे आज भी अंजान ही है 

पर हमारे दिल को एक बस उसकी पहचान ही है 

जो थी दास्तां मुहब्बत की, वो जाने ऐसे क्यों सिमट गई 

थी पहचान जिससे हमारी, होकर दूर उससे पहचान भी कहीं पर खो सी गई 



वो दूर रहे हमसे ये उसका फैसला है 

हम रखेंगे उसकी यादों को अपने दिल में ये हमारा फैसला है 

किसी के ऐसे दूर होने से प्यार कभी कम नहीं होता 

हर बार जीत जाये आशिक़ ये मुहब्बत का मिजाज़ नहीं होता 

ये होगी ज़माने के लिए 

हमारे दिल वो पल भर के लिए भी दूर होता नहीं 

किसी से ऐसी मुहब्बत करना गुनाह नहीं होता 

हर ओर हमें उसकी परछांई दिखती है 

किसी के कहनें से देह से परछांई कहाँ दूर होती है 



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