उस रस्तें जायें कैसे हम

Law life aur multigyan
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Poetry 


उस रस्तें जायें कैसे हम जिस रस्ते सबको जाना है 

हम बना लेंगे रस्ता अपना जिस रस्ते हमको जाना है 

हर भीड़ में यहाँ एक होड़ सी है 

ज़िन्दगी जैसे किसी दौड़ सी है 

हम कैसे ओढ़ लें कोई नकाब 

 कैसे बन जायें वो जो हम हैं ही नहीं 

राह मुश्किल होगी पर होगी अपनी 

होंगे किसी और की राह के आदी नहीं 

 रस्तों के काटें कर देंगे हमें और भी मज़बूत 

ना रख ये पायेंगे हमें मंजिल से दूर 

एक मंजिल ही है जो जीने का बहाना हैं

अभी तो चल पायें हैं कुछ ही कदम, आगे मीलों तक जाना है 

 


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