जो ज़िन्दगी का हिस्सा था कभी

Law life aur multigyan
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Poetry 


 जो ज़िन्दगी का हिस्सा था कभी

अब किसी तस्वीर का हिस्सा है 

जो कह सकतें नहीं हम लफ्जो़ं में 

अधूरी मुहब्बत का ऐसा अनकहा किस्सा है 

हम जी लेतें थें अकेले ही, मिल जाता था तन्हाई में भी सुकून

पर जबसे आदत आदत लगी उनकी 

बिन उनके ना रहा जीने का जुनून 

हमें अपनी आदत लगा, अब हमसे दूर जाकर 

वो खुश हैं अपनी दुनिया में जाकर 

वो हो गयें किसी और की गलियों की रौनक ,हमसे दूर जाकर

दिल तो आज भी उदास हैं उन्हें खुद से दूर पाकर 



ये जान भी बेजान सी है 

परवाह भी अब बेपरवाह सी है 

किसी की आदत में अब ये दिल ढ़लता नहीं 

किसी के पीछे उसकी राहों पर चलता नहीं 

अब अपनी पुरानी आदतों से भी दूर हैं हम 

अब ज़माने से भी ज़रा दूर हैं हम 

हमें अब शौक नहीं किसी की महफ़िल का 

अब इंतज़ार भी ठहरा सा है इस दिल का 

अब मीलो अकेले ही चल लेतें हैं हम 

किसी का हमपर यक़ीन भी लगता है हमें बेरहम 











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