Poetry
ना जीने की वजह दी, मुहब्बत में ऐसी सज़ा दी
ना मिल सकी मंज़िल इश्क़ में ,वक़्त ने ऐसी सज़ा दी
ना थी आदत रहनें की जिसके बगैर
अब ज़िन्दगी में उसका साया तक नहीं
हर रोज़ दिल कहता है उसे भूल जाने को
पर खुद एक पल के लिए उसे भूलता नहीं
हम बार खयालों में उसका ही ख़याल है
पर वो बेफिकर है अब उसे ना मेरा ख़याल है
अब जायें किस राह पर ना किसी ओर जाने की उसने मुझे राह दी
ना मिल सकी मंज़िल इश्क़ में ,वक़्त ने ऐसी सज़ा दी


