Poetry
हमनें खुद को टूटा पाया
देखा जो नज़रों को फेर खुद को बिखरा पाया
क्या वजह थी बिखरनें की समझ ना सकें
देखा खुद को तो खुद को भी वेबजह पाया
ज़िन्दगी ढल रही है ढलते हुये दिन तरह
हर पल गुज़र रहा है एक झोकें की तरह
जी सकें किसी पल में बस वो पल ही अपना है
जिसे चाह कर भी पा ना सकें हम, वो बस एक सपना है
हर किसी की आजमाइश तो सच नहीं कहती
बिखरनें पर समेट ले हमें ऐसी ज़मी कहाँ है मिलती
ना बिखरनें का ग़म है ना टूट जाने का
अब वक़्त है खुद के पास लौट आने का
कुछ वक़्त यूं गुज़ार दिया तो ज़माने से अगल खुद को कहीं और पाया
थें हम बिखरे थें पर खुद को फिर से ज़िंदगी के करीब पाया


