Poetry
इन हाथों की लकीरों में तू नहीं तो ना सही
मेरे नसीब की लकीरों में शामिल हो जाना
दूर हो कर भी जो रहे पास में
तुम मेरा वो एहसास बन जाना
ना लिख सकें अपना नाम हम मुहब्बत के पन्नों पर
पर तुम एक पल के लिए मेरा नाम बन जाना
हो वक़्त कभी ऐसा की ज़माना मांगे मेरी पहचान
तुम पल भर के लिए मेरी पहचान बन जाना
मैनें अपनी पहचान बनायी नहीं इश्क़ में ,तेरी दी पहचान काफी है
जो कर दी हो ख़ता ऐसा करके तो तुमसे मेरी माफी है
हम हो गयें हर पल में तेरे मुहताज
ज़माना अब बाकी नही हममें
अब तेरा होकर खुद का मुझमें कुछ बाकी नहीं
तू हाथों की लकीरों में शामिल नहीं तो ना सही
पर तुझसे अलग मेरा कोई वजूद नहीं


