ये अंधेरा भी छट जायेगा
बदकिस्मती का धागा कट जायेगा
जो उजाला हमसे मीलों दूर खड़ा है
वो कल आकर हमसे लिपट जायेगा
हर सफर सुहाना होता नहीं ,हर दिन आराम होता नहीं
पर हर सफर कुछ सिखा कर जाता
हमें कच्ची मिट्टी से आगे बढकर इंसान बना कर जाता है
बिन कुम्हार के आकार दिये घड़ा भी कहाँ बन पाता है
पर जो एक बार घड़ा बन जाता है, ना जाने कितनों की प्यास बुझाता है
बस हालातों के हाथों संवर कर जो इंसान बन जाता
भला कौन सा अंधियारा उसको रोक पाता
ये वक़्त अभी सबर का है
ये वक़्त अभी सफर का है
इस सफर से आगे अभी उजालों तक जाना है
राह में पड़े रोड़े को बस हिम्मत से रौद के जाना है
फिर हर बन्धन कट जायेगा
हर गहरा अंधेरा छंट जायेगा


