जिसने मुड़ के पीछे देखा नहीं

Law life aur multigyan
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Poetry 



जिसने मुड़ के पीछे देखा नहीं ,वो क्या लौट के वापस आयेगा 

अगर आ भी गया लौट कर, जीने की हर वजह को ले जायेगा

गुज़र गया वो दौर जब हमारा एहसास उसको था 

रुक जायेगा ये सिलसिला एक पल में इस एतबार ना मुझको था 

झूठी ही सही पर हमसे मुलाकात कर लेना 

जो आ जाये मुहब्बत हमपर एक पल को अश्कों से आँखों को भर लेना 

 ना होने देंगे हम ज़माने रुसवाई तेरी है खुद की कसम हमें

असल में तो हम हो गयें तुझसे अजनबी, ख्वाबों में बस अपना समझ लेना 

 ना लेंगे कभी तेरा नाम ना करेंगे बदनाम तुम्हें 

अगर हो गई मर्ज़ी तेरी तो हमारा नाम लेकर हमें बदनाम ही कर लेना 




चलो इश्क़ में बदनामी ही सही ,तूने इस क़ाबिल तो माना

वक़्त जब भूल गया हमारे नाम को भी 

तब तूने हमारे वजूद को माना 

गुज़ारिश हम मुहब्बत की लेकर तेरे पास आयें थें

चलो तुमनें अपनी नफ़रत के भी क़ाबिल तो माना 

क्या तय करें हम मंजिल अपनी 

हर रस्ता हमें तेरी ओर ले जाता है 

आंखों में अगर छायें कोई ख़्वाब तो वहाँ भी बस नज़र तू ही आता है 

 ये ज़माना दे ना सका हमें मुहब्बत का एक पल भी उधार 

चलों तुमने हमें अपनी नफ़रत का हकदार तो माना 



 

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