Poetry
इन सपनों को किसी और के पंखों की ज़रूरत नहीं
उड़ान को बस एक जज़्बा ही काफी है
खुद के बिखरे पंखों से हम भरेंगे उड़ान
पा ही लेंगे हम वो जो है अपना मुक़ाम
क्या रोक पायेगा कोई उन हौसलों को
जो मिटा दे राही और मंज़िल के बीच के हर फासलों को
ग़म आज भी नहीं और कल भी ना होगा
अपने हिस्से का आसमान ज़रूर एक दिन अपना ही होगा
खुद में खुद का ही जज़्बा है
किसी और जज़्बे की ज़रूरत नहीं
लें उधार में हम किसी के पंख ये हमारी फ़ितरत में नहीं
जो अपनें हक का आसमान है
उसे पानें को बस एक छलांग ही काफी है
उस ऊंची उड़ान को बस एक जज़्बा ही काफी है


