Poetry
इस जहां में नहीं तो ना सही
मुहब्बत के जहां में हमारा नाम होगा
होगी मुहब्बत मुकम्मल उस जहां में
हमारी मुहब्बत का ऐसा अंजाम होगा
तब ना होगी ज़माने की फिकर
और ना होगी बेकदरी हमारी मुहब्बत की
ना कोई वहाँ मुहब्बत का बेकदर होगा
जो घाव हमें मुहब्बत में दियें हैं ज़माने ने
वो सब के सब वहाँ भर जायेंगे
यहाँ कर ले हमें ज़माना अगल
पर उस जहां में हम तुम मिल जायेंगे
तब वक़्त होगा मुकद्दर की मरम्मत का
आज नहीं है मुहब्बत हमारे मुकद्दर का हिस्सा
पर उस जहां में हम अपने मुकद्दर को मुहब्बत से मिलायेंगे
आज हम गुमनाम ही सही
पर तब मुहब्बत की दुनिया के सितारों में शुमार हम भी हो जायेंगे


