Poetry
मेरी रुह पिघल रही है
सारी खुशियों की वजह भी छिन रही
जिसे आबाद करनें का था ख़्वाब मेरा
वो ज़िन्दगी भी जल रही
ना जाने कहाँ भटक रहा है मन
इसे पनाह कहीं मिलती नहीं
एक वजह ढूढ़तें हैं ख़ुशी की
वो वजह भी मिलती नहीं
हम कोसे खुद की किस्मत को, या लगा दें किसी पर इल्ज़ाम
वजह फिर भी मिलती नहीं, क्यों है ये जिंदगी है नाकाम
हर हालात में जीने की अदा आती थी हमें
पर अब क्यों है ज़िन्दगी से दूरी इतनी
ना रहा कोई पता, ना कोई ठिकाना रहा
ना जाने क्यों घेरे हुये है हमें ये मजबूरी


