हम हो ना सकें उनके

Law life aur multigyan
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Poetry 


 

हम हो ना सकें उनके ना जाने क्या मजबूरी थी 

वो रहें हमेशा पास में फिर भी मीलों की दूरी थी

ना कोई शिकवा किया ना कोई शिकायत की 

लफ्ज़ों की ऐसी दूरी थी  

रह के पास भी अंजाने रहें 

ना जाने क्या मजबूरी थी 

थी रज़ामंदी उनकी भी, थें हम भी रज़ामंद उनके साथ

बिन साथ चले एक भी कदम ना जाने क्यों छूट हमारे हाथ 

 था तक़दीर का खेल या थी हमारी मुहब्बत में कमी 

देकर वादा ज़िन्दगी भर साथ चलनें का, दो पल मे छूट गया हमारा साथ 




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