Poetry
ये वक़्त अपने मुताबिक है
ये वक़्त भी गुज़र जायेगा
अंधेरो का पहरा भी छंट जायेगा
या और गहरा अंधेरा छा जायेगा
ना रह जायेगा कोई निशान अपना
एक वक्त ऐसा भी आयेगा
जो आज भला है, उसके कल भी भला होने का यक़ीन क्या करें
जो बिगड़े हालात तो, हर अपना अंजान हो जायेगा
ये वक़्त अपने मुताबिक है
कल ना जाने किसके मुताबिक हो जायेगा
क्या करें गुमान अपनी हैसियत का
ये तो चंद पलों की मेहमान है
आज जो ताज सजा है हमारे माथे पर
कल किसी और के माथे सज जायेगा


