Poetry
मेरी धुंधली सी परछाई, जो खो रही अपनी पहचान हैं
मगर अपनें खोनें की वजह से अंजान है
मन हर उम्मीद का दामन छोड़ रहा है
कुछ है ऐसा जो भीतर से तोड़ रहा है
मेरे हक में ना कोई आसमान टुकड़ा है
ना मेरे हिस्से में कोई ज़मी है
हर बार चोट खाकर मर रहा मेरा ज़मीर है
कोई ग़लती है या कोई ख़ता है ये
ना जाने कैसी सज़ा है ये
मेरी पहचान भी जड़ से उखड़ रही है
मेरी रुह भी जैसे पिघल रही है
आ गयें ऐसे चौराहे पर हम
जहाँ से है मंज़िल का रस्ता गुमनाम
क्या कहुँ की ये बस मेरा किस्सा है
इस ज़माने के हर इंसान का कुछ ऐसा ही किस्सा है
ना वजह की ख़बर ना खुद ठिकाना है
हम सब ज़माने के राहीं बस हमें ऐसे ही चलते जाना है


