Poetry
दिल की ख्वाहिशों पर किसका ज़ोर है
ये तो हर हद से आगे जाकर कर बैठता है मुहब्बत
इस पर कोई ज़ोर चलता नहीं
कर ले कोशिश कितनी भी कोई, ये हद गुज़रता ही है
खुद के ऊपर मुहब्बत की चोट लेता ही है
नाकाम हो जातीं हैं कोशिशें सारी इसे मनाने की
ये मुहब्बत का ग़म उठा लेता ही है
क़सूर खुद का कहें या ठहरा दें कसूरवार इस दिल को
मुहब्बत में हम भी ज़रा कमज़ोर हुयें
रोक ना पायें इस दिल को
ना है ग़लती हमारी ना क़सूर है इस दिल का
कोई भी खुद को हार जाये ये ही सिलसिला है इश्क़ का


