मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह

Law life aur multigyan
0

Poetry 


मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह 

ये उम्र भी फिसल रही 

जैसे कोई मोमबत्ती दुसरे को रौशन करनें को हर पल में  बस पिघल रही है 

ज़माने को रौशन करनें को हम भी पिघलतें रहें

कुछ अनमोल से पलों को बिन जीये हम भी बस चलतें रहें 

पलकें झपकें जितनी देर में उतनें का भी करार नहीं 

पर वक़्त मेरे करार के लिए पल भर के लिए भी ठहरता नहीं

वक़्त की आंधी ना जाने हमें कहाँ ले आयी 

वक़्त के गुज़र जाने पर हमें अपने वक़्त की याद आयी 

मुट्ठी से फिसली रेत अब क्या मुट्ठी में समायेगी 

जो वक्त गुज़र गया उसकी तो बस यादें ही आयेंगीं

ना हाथ लगी वो रेत ना उस उम्र को हम जी पायें 

जानें कहाँ से शुरुआत हुयी थी 

और हम ना जाने कहाँ चले आयें



 

 

 

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)