Poetry
मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह
ये उम्र भी फिसल रही
जैसे कोई मोमबत्ती दुसरे को रौशन करनें को हर पल में बस पिघल रही है
ज़माने को रौशन करनें को हम भी पिघलतें रहें
कुछ अनमोल से पलों को बिन जीये हम भी बस चलतें रहें
पलकें झपकें जितनी देर में उतनें का भी करार नहीं
पर वक़्त मेरे करार के लिए पल भर के लिए भी ठहरता नहीं
वक़्त की आंधी ना जाने हमें कहाँ ले आयी
वक़्त के गुज़र जाने पर हमें अपने वक़्त की याद आयी
मुट्ठी से फिसली रेत अब क्या मुट्ठी में समायेगी
जो वक्त गुज़र गया उसकी तो बस यादें ही आयेंगीं
ना हाथ लगी वो रेत ना उस उम्र को हम जी पायें
जानें कहाँ से शुरुआत हुयी थी
और हम ना जाने कहाँ चले आयें


