बेशक अभी ये दास्तां है अधूरी

Law life aur multigyan
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Poetry 



बेशक अभी ये दास्तां है अधूरी 

लेकिन ये कैसे पूरी होगी कभी 

अभी ज़रा और है इंतज़ार बाकी 

क्या ये इंतज़ार भी खत्म होगा कभी 

अभी वो भी अंजान है इन दुरियों का अंजाम से 

क्या उसे कभी होगा यकीन 

 ना थी आदत अलग रहनें की 

फिर भी अरसे से जुदा हैं हम 

अब तक इन दुरियों का एहसास तक नहीं उसे 

मैनें ज़माने से जी भर कर देखा तक नहीं उसे 

ये दुरियां ना जाने क्या कहर लायेंगीं

शायद अपनें साथ मेरी जान लेकर जायेगी 

वक़्त रहते ही वो वक़्त आ जाये 

उसे भी दुरियों का एहसास हो जाये 

अभी तक सम्भाल रखा था खुद को 

पर कब तक हम रोक सकेंगे खुद को 

कहीं वक़्त और भी फ़ासले ना ले आये 

ये अधूरी दास्तां अधूरी ही ना रह जाये 






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