Poetry
किसी के हिस्से में धूप तो किसी के हिस्से में छाँव पड़ी है
कोई दिन खुशियों से भरा तो जाने कितनी रातें ग़मों से घिरी हैं
जिस रस्ते के कभी सिकन्दर थें हम
आज उस रस्ते पर पैरों में ज़जीरें पड़ी हैं
आने वाला कल बुलाता है अपनी ओर
तो बीता कल अपनी ओर घसीट ले जाता है
जिस ज़माने में मशहूर थें कभी
आज उसकी गलियों में अंजान से फिरतें हैं
वक़्त ने करवट क्या बदली ,हम मारे मारे फिरतें हैं
पर ये मुकद्दर मुझ अकेले का तो नहीं
ग़मों की पोटली बस मेरी ही झोली में तो नहीं
सफर अकेले का है
पर इस राह पर मुसाफ़िरों की कमी नहीं
जिसकी झोली में हो ग़मो की सौगात,ऐसे बस एक हम ही तो नहीं
आज वक़्त की साज़िश हमारी खिलाफ़त की ओर है
हर तरफ फैला बर्बादी का शोर है
पर वक़्त करवट फिर लेगा,हमें खुशियों की सौगात फिर देगा
आज जो राहें अंधेरो से घिरीं है
कल राहों के अंधेरे भी छट जायेंगे
पैर भी ज़जीरों के अलग हो जायेंगे
हम थें अपनी राहों के सिकन्दर
एक बार फिर से सिकन्दर बन जायेंगे


