अंजान सी राहों के हम अंजान से राही

Law life aur multigyan
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Poetry 


अंजान सी राहों के हम अंजान से राही 

ना नाम की फिकर है ना पहचान की 

ना बीते कल का अफ़सोस है  

ना आने वाले कल को देखने की बेताबी

 इस पल में जी लें हम बस इतना ही है काफ़ी 

ना ठिकाना है कोई ,ना है ठिकाने का इंतज़ार 

यूं हीं बस चलते रहना, जाना है मज़िल के पार 

क्या मलाल की क्या पीछे छूट गया 

क्या ख़ुशी उसकी जो आगे मिल जायेगा 

जो पीछे छूट गया वो भूल जायेगा 

जो आगे मिलेगा वो भी वक़्त के साथ पीछे छूट जायेगा 

हम राही हैं हमें किसी ग़म को क्या दिल से लगाना 

मंज़िल दे जाती है हर रोज़ आगे बढ़ने का बहाना

बस राहों पर नज़र है, मंज़िल से है अपना वास्ता

हम तो राही हैं हमें बस तय करते जाना है अपना रास्ता 






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