Poetry
ये सफर बस अकेले का है
भला हमसे रस्ता साझा कौन करे
इस सफर में ठोकरें हैं हज़ारों
भला हमारे लिए इन ठोकरों से कौन लड़े
हम चलते रहें हैं अकेले ही, हमें चलते रहना है अकेले ही
भला अब बीच सफर में इंतज़ार किसका करें
हम खुद ही गिर के संभल लेंगे
हम अकेले रस्ते तय कर लेंगे
भला रस्ता किसी और का क्यों देखें
भरोसा किसी और का क्यों रखें
ये सफर बस अकेले का है
किसी और का इंतज़ार भला कौन क्या रखें


