Poetry
शुरूआत हुयी है तो अंत भी होगा
आज पतझड़ है तो कल बसंत भी होगा
उस शाख की क्या करें फिकर
जो खुद ही टूट कर अलग हो गयी
जड़ तो भी ज़िदा है
कौन रोक सकता है उसको जो आसमान का आज़ाद परिंदा है
कल आयेगा बसंत सारे घाव भर जायेंगे
आज जो रस्ता रोके खड़ें कल वो भी थक जायेंगे
ये वक़्त ज़रा संयम का है
ठोकरें लगना ज़िन्दगी का नियम सा हैं
आज ठोकरों की गिनती क्या करें
कल इनसे ही तो निखरना है
ये ठोकरें इतनी मज़बूत नहीं जो इनकी वजह से बिखरना है
बस हौसला ही काम आयेगा
अब बस इससे यारी करनी है
झुक झुक कर बहुत वक़्त बिताया, अब आसमान में उड़ान भरनी है


