Poetry
रुह ना जान सकी रुह की भाषा
हम समझा ना सकें उसे इश्क़ की भाषा
टूट कर बिखर गयें हम हज़ारों टुकड़ों में
कैसे बतायें कि हमनें खुद दोबारा कैसे तराशा
दिल का हाल समझानें की भाषा क्या है
जो आँखों का दर्द देख कर भी ना समझ सकें हाल दिल का
मुहब्बत में ऐसे महबूब की एहमियत ही क्या है
हमारी खामोशी को वो हमारी ख़्वाहिश समझ गया
ऐसी नादानी कर के वो क्या गज़ब कर गया
अब दर्द का बोझ हम उठायें कैसे
है कितनी मुहब्बत उसे बतायें कैसे


