Poetry
रो कर खुद ये नैना चुप हो गयें
बह चलें थे जो आँसू वो आँखों में ही खो से गयें
पहले समझाया अपनें दिल को
पर बंधे से जज़्बात दिल पर बोझ बन गयें
हम ना जान सकें हम खुद से ही कब बिछड़ गयें
जमें थें जो पैर ज़मी में, ना जाने कब वो उखड़ गयें
फैला है सन्नाटा चारो ओर
बिखरें हैं जज़्बातों के टुकड़े हर ओर
अब कैसे समेट कर लाऊं उन्हें
मैने यूं हीं बिखर जाने दिया जिन्हें
मेरी परछाईं भी मुझे दिखती नहीं
मेरी खुशियां मैं लाऊं कहाँ से,किसी बाज़ार में वो बिकती नहीं
इन आँखों को आँसुओ नें घेर लिया
आँखों से कुछ पल खुद को बहनें की इजाज़त को लिया
फिर आँखें भी अपनी ज़िद पे पड़ीं
ना बह सकें यें आँसू दो घड़ी
ना लगी फिर ख़बर जज़्बातों की
वो मर चुकें या फिर ज़िन्दा हैं
हो चुका तन कबका दफन पर ना जाने ये कैसी ज़िद्दी आस है ये जो अभी तक ज़िन्दा


