बेजान सी ये ज़िन्दगी रह गयी

Law life aur multigyan
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Poetry 


बेजान सी ये ज़िन्दगी रह गयी

निराश सी हर आस रह गयी 

हम रह गयें जाने किस भरम में 

बिन राह के अधूरी हर मंज़िल रह गयी 

अब चले किस ओर कोई राह मिलती नहीं 

ज़िन्दगी भी अपने गिले शिकवे अब हमसे करती नहीं 

खुद को तलाशें या तराशें खुद को 

अधूरी मुझसे रब की बन्दगी रह गयी 

हम अंजान थें हर असलियत या खुद को इससे वाकिफ ना कराया 

आकर दोराहे पर उलझी हुयी ये ज़िन्दगी रह गयी 





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